सूरदास के पद की व्याख्या 0855 0 प्रश्न 7. 


चरन-कमल बंद हरि राई ।। 


जाकी कृपा पंगु गिरि लंधै, अंधे कौ सब कुछ दरसाई॥ 


बहिरौ सुनै, गैंग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई । 


सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंद तिहिं पाई ॥ [202, 5, रा

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